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Proper Use of Haritaki (Harad)


आमतौर पर आयुर्वेद की अधिकांश औषधियों को लोग बिना सोचे-समझे प्रयोग करने लगते हैं, जिसके कई बार दुष्प्रभाव भी नज़र आते हैं।

 

उदाहरण के रूप में आयुर्वेद की ऐसी ही एक औषधि है हरड़ (हरीतकी)!


वैसे तो इस औषधि को विभिन्न रोगों में प्रयोग किया जाता है लेकिन हरड़ को सामान्यतः लोग उदर (पेट) से जुडी समस्याओं में लेते हैं जिसका प्रभाव भी उदर की समस्याओं में बहुत ही प्रभावशाली होता है, लेकिन जब इस औषधि को कोई व्यक्ति नियमित रूप से सेवन करता रहता है तो उसके कई अनचाहे दुष्प्रभाव भी सामने आते हैं। जैसे कि यदि कोई व्यक्ति हरड़ को कब्ज (विबंध) में लगातार लेता है, तो लम्बे समय तक इसका प्रयोग करने पर उस व्यक्ति को कब्ज की समस्या और बढ़ जाती है क्योंकि हरड़ में मधुर आदि पांच रस होते हैं (लवण के अतरिक्त सभी रस) मुख्य रूप से यह औषधि कषाय रस प्रधान होती है। 
 

जो व्यक्ति विबंध से पीड़ित होता है उसमें सामान्यतः वात प्रकोप होता है तथा इस अवस्था में रोगी की वात की गति भी प्रतिलोम हो जाती है। ऐसी स्थिति में लम्बे समय तक कषाय रस प्रधान हरड़ का सेवन करने से रोगी के शरीर में रूक्षता और अधिक बढ़ती जाती है जिससे कुछ समय पश्चात रोगी कहता हैं कि उसकी कब्ज कि समस्या और अधिक बढ़ गई है।

 

हरड़ का अल्प काल के लिए प्रयोग करने से लाभ इसलिए मिल जाता है क्योंकि हरड़ में विरेचक गुण होता है, जिससे इसके सेवन करने वाले को ऐसा महसूस होता है कि उसे हरड़ सेवन से बहुत लाभ मिल रहा है।
 

हरड़ का यदि किसी व्यक्ति को वास्तविकता में लम्बे समय तक प्रयोग करना है तो उसे प्रत्येक ऋतु में हरड़ के साथ प्रयोग किये जाने वाले अनुपान को ध्यान रखना होगा, आयुर्वेद के संहिताकार आचार्य सुश्रुत एवं भावप्रकाश ने हरड़ को सही तरह से प्रयोग करने का एक उचित एवं प्रभावी तरीका बताया हैं, इसे हम ऋतु हरीतकी के नाम से जानते हैं:


ग्रीष्म ऋतु में हरड़ का प्रयोग - गुड़ के साथ
वर्षा ऋतु में हरड़ का प्रयोग - सैंधव के साथ
शरद ऋतु में हरड़ का प्रयोग - शर्करा के साथ
हेमंत ऋतु में हरड़ का प्रयोग - शुंठी के साथ
शिशिर ऋतु में हरड़ का प्रयोग - पिप्पली के साथ
वसंत ऋतु में हरड़ का प्रयोग - मधु के साथ

 

उपरोक्त बताये गए तरीके से जब हरड़ का सेवन किया या कराया जाता है तब हरड़ रसायन के समान कार्य करती है।
 

आशा है कि आयुर्वेद के चिकित्सक अन्य औषध द्रव्यों के सेवन में भी रस, ऋतु, रोग, रोगी आदि का ध्यान रखते हुए अपने रोगियों पर सेवन करायेंगे व आयुर्वेद का मान-सम्मान बढ़ाएंगे व आयुर्वेद के प्रभावों को वास्तविक रूप में जन-जन तक पहुँचायेंगे।


डॉ.अभिषेक गुप्ता-आयुर्वेदाचार्य