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जनपदोध्वंस की स्थिति में आयुर्वेद चिकित्सक अपना योगदान देकर आयुर्वेद व स्वयं को गौरवान्वित करें!


जनपदोध्वंस की स्थिति में आयुर्वेद चिकित्सक अपना योगदान देकर आयुर्वेद स्वयं को गौरवान्वित करें !

 

आयुर्वेद एक ऐसा शास्त्र है, जिसके चिकित्सा सिद्धान्त विगत हज़ारों वर्षों से आज के आधुनिक युग के समय में भी उतने ही अटल, अकाट्य व सिद्ध बने हुए जितने प्राचीन काल में हुआ करते थे । आयुर्वेद के मनीषियों / आप्तों के द्वारा कहा गया जनपदोद्धवंस का सिद्धान्त भी इसी तरह का एक सिद्धान्त है जिसकी उपयोगिता प्राचीन काल में उतनी नहीं रही होगी, जितनी आज के समय में है ।

 

 

 

 

जनपदोद्धवंस :

किसी रोग - विशेष, ऋतु विकार या अन्य आत्यायिक कारण से जनसंख्या के बड़े अंश का नुकसान होना या नाश हो जाना और जनपद का उजड़ जाना "जनपदोद्धवंस" कहा जाता है। ऐसे रोगों की उत्पत्ति का मुख्य कारण अधर्म (बुरे-अनैतिक कार्यों से होने वाले रोग), प्रज्ञापराध (मन की चिंता, शोक, क्रोध आदि से उत्पन्न होने वाले रोग), स्वस्थवृत्त - सदवृत्त के पालन न करने से होने वाले रोगों को ही जनपदोद्धवंस का प्रमुख कारण माना गया है। 

इनके अतरिक्त जनपदोद्धवंस के विषय में आचार्य आत्रेय ने कहा है कि 4 तरह के पर्यावरणीय भावों के दूषित हो जाने से भी एक ही समय में एक ही स्थान पर हज़ारों, लाखों की संख्या में लोग एक ही तरह के रोगों से पीड़ित हो जाते हैं !

यह चार कारण हैं :

1 . अनारोग्यकार वायु         2 . अनारोग्यकार जल

3 . अनारोग्यकार देश          4 . अनारोग्यकार काल

इन चारों के दूषित होने के भी विभिन्न कारणों का वर्णन हमारे शास्त्रो में हज़ारों वर्षों पूर्व ही कर दिया गया था ।

 

आज के वर्तमान समय में देश और दुनिया के स्वास्थ्य से जुड़े लोग लगातार विभिन्न तरह के प्राणघातक व गंभीर रोगों के निराकरण के उपायों को खोजने के लिए जूझ रहें हैं, हज़ारों करोड़ रुपयों को खर्च करने के बाद भी रोगों के नाश/निवारण का कोई स्थाई समाधान आधुनिक चिकित्सा जगत के द्वारा अब तक नहीं खोजा जा सका है, बल्कि रोगों के निराकरण के प्रयासों को करते-करते अब स्थिति ऐसी बन गई है कि स्वास्थ्य जगत के लोगों ने रोगों के निराकरण या समापन को लेकर अपने हाथ खड़े कर दिए हैं ।

 

आज के समय में गंभीर व प्राणघातक रोगों की यह सूची लगातार बढ़ती चली जा रही है ऐसे रोगों में टी.बी., कैंसर, डेंगू, स्वाइन फ्लू, मलेरिया, एड्स (एच.आई.वी.), मधुमेह (डायबिटीज), किडनी फेलियर, हेपेटाइटिस, अस्थमा, ह्रदय से सम्बंधित रोग, मानसिक रोग, गुटका, तम्बाकू, शराब, ड्रग्स आदि मादक पदार्थो के सेवन से होने वाले रोग आदि प्रमुख हो चुके हैं जिनसे ग्रसित हो जाने के बाद रोगी का जीवित रह पाना भी कठिन होता जा रहा है ।

 

इस समय देश में शायद ही ऐसा कोई परिवार हो जो किसी न किसी रोग से पीड़ित न हो, इस स्थिति को अब आधुनिक जगत में सिर्फ व्यवसाय की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है।

 

वर्तमान समय में वर्ष 2016 में भारत का स्वास्थ्य जगत से जुड़ा बाजार 100 खरब डॉलर का आंकड़ा पार कर चुका है और बहुत ही चिंताजनक बात यह है कि इस आंकड़े को वर्ष 2020 तक 280 खरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान लगाया जा रहा है जो कि आने वाले सिर्फ पांच वर्षों में तीन गुना हो जायेगा । 

 

इस आंकड़े को देखकर ही आप यह कल्पना कर सकते है कि आने वाले समय में स्वाथ्य से जुड़े और जाने कितने गंभीर दुष्परिणाम देखने को मिलेंगे।

 

(यह आंकड़े इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन के आंकड़ों पर आधारित हैं, http://www.ibef.org/industry/healthcare-india.aspx)

 

आयुर्वेद चिकित्सा जगत से जुड़े चिकित्सकों के पास यह एक बड़ा अवसर है कि इस समय में हम सभी मिलकर  आयुर्वेद के माध्यम से विभिन्न गंभीर व जटिल रोगों से पीड़ित लोगों के जीवन का स्तर बढ़ाने के साथ - साथ रोगों के उन्मूलन की दिशा में ठोस व सटीक तथ्य व आकड़ें प्रस्तुत कर देश की सरकार व सामान्य जन-मानस  को आश्वस्त कर सकते हैं कि आयुर्वेद के माध्यम से न सिर्फ विभिन्न गंभीर रोगों से पीड़ित होने से लोगों को बचाया जा सकता है अपितु रोगों से ग्रस्त रोगियों को भी स्वस्थ किया जा सकता है ।

 

इसके लिए एक छोटा सा उदाहरण आप सभी को बता रहा हूँ : अभी कुछ दिनों पूर्व देशभर में डेंगू रोग से पीड़ित लाखों लोग अस्पतालों में जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे जिनमें से कई लोग इस रोग से पीड़ित होने के बाद अपने जीवन को नहीं बचा सके, इस रोग से पीड़ित होने वाले अधिकांश रोगी अपने उपचार के लिए आधुनिक चिकित्सा के उपचार के लिए गए जहाँ अधिकांश लोग उपचार के माध्यम से या तो ठीक न हो सके और जो ठीक हुए भी उनको हज़ारों रूपए खर्च करने पड़े।

 

वहीं दूसरी ओर जो लोग आयुर्वेद में अपना उपचार कराये वे बहुत ही अल्प खर्च में स्थाई रूप से डेंगू रोग से न सिर्फ स्वस्थ हुए अपितु इस ज्वर के बाद होने वाले असहनीय दर्द से भी बच सके । हमारे स्वयं के चिकित्सालय में हमने आयुर्वेद के एक छोटे से सिद्धान्त मुहुर्मुह (औषध सेवन कराने का एक तरीका) को अपनाकर चिकित्सा कि जिसमें आयुर्वेद की अमृतारिष्ट और महासुदर्शन घन वटी को अल्प मात्रा में थोड़े - थोड़े अंतराल के बाद दिन में 5 - 6 बार तक देना आरम्भ किया, व इसके अतरिक्त आहार-विहार से जुड़े कुछ सामान्य परिवर्तन करवाये जिसके पश्चात लगभग प्रत्येक रोगी को लाभ मिला और लगभग हमने अपने यहाँ 200 से अधिक रोगियों को इस सामान्य चिकित्सा उपक्रम से स्थाई लाभ दिया ।

 

उपरोक्त उदाहरण का अर्थ यह नहीं है कि आप भी एक नुस्खा पकड़कर रोग की चिकित्सा आरम्भ कर दें, अपितु इस उदाहरण को इसलिए बताया है कि आप भी आयुर्वेद के सिद्धान्तों का सही तरह से अध्ययन करके चिकित्सा में प्रयोग करें तो रोग का शमन करना आसान होगा जिससे सिर्फ आपका मान - सम्मान बढ़ेगा अपितु आयुर्वेद का मान-सम्मान भी लगातार बढ़ेगा

 

आशा है कि इस लेख को सिर्फ पढ़कर आप भूलेंगे नहीं अपितु आप भी संकल्प लेकर आयुर्वेद शास्त्रों का सही तरह से अध्ययन कर पीड़ित रोगियों को रोगमुक्त कर समाज में नाम, यश,धन, सम्मान आदि अर्जित कर अपने चिकित्सक होने के कर्त्तव्य का सही तरह से पालन कर सकते हैं ।

 

                                                                                                जय धन्वन्तरि ! जय आयुर्वेद !

आपका

     डॉ. अभिषेक गुप्ता